610 साल पहले बस्तर लाए गए थे भगवान जगन्नाथजी के विग्रह

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जगदलपुर। जगन्नाथ मंदिर में गोंचा पर्व 1408 से मनाया जा रहा है। इस पूजा में शामिल विग्रहों को 360 घर आरण्यक ब्राहम्ण समाज अपने साथ यहां पर 610 साल पहले लेकर आया था । इन सभी विग्रहों को महानीम की लकड़ी से बनाया है। तब से लेकर अब तक केवल भगवान जगन्नाथ का एक ही विग्रह खराब हुआ था ।
1970 में खराब हुए इस विग्रह की जगह समाज के लोगों ने दंतेश्वरी मंदिर के सामने स्थित रूद्रप्रताप देव टाउन क्लब में मौजूद महानीम की लकड़ी से जगन्नाथ का विग्रह बनवाया। समाज के बनमाली पानीग्रही ने बताया कि इसके अलावा अब तक एक भी विग्रह में किसी प्रकार की खराबी नहीं आई है। सालों से समाज के लोग इन्हीं विग्रहों की पूजा करते आ रहे हैं। अनसर काल के बाद नेत्रोत्सव में इन सभी विग्रहों की साज सज्जा की जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद होते हैं।
जगन्नाथ पुरी से लाए गए इन विग्रहों को शहर के जगन्नाथ मंदिर में रखा गया है। मान्यता के अनुसार सात खंड में रखे गए इन विग्रहों में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के एक-एक विग्रह शामिल हैं। केवल एक खंड में ही चार विग्रह रखे गए हैं। जगन्नाथ मंदिर में रखे गए इन विग्रहों को तीन रंगों में रखा गया है। जिसमें भगवान जगन्नाथ को काले, सुभद्रा को पीला और बलभद्र को सफेद रंग के विग्रह में विराजित किया गया है।
महाराजा पुरुषोत्तम देव ने पुरी से लाए गए जगन्नाथ स्वामी के विग्रहों को बस्तर में स्थापित करने के बाद जगन्नाथपुरी की तर्ज पर यहां भी गोंचा पर्व प्रारंभ करवाया । रथ पति की उपाधि से प्राप्त 16 चक्कों के रथ में से राजा ने 4 चक्कों को 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज को अर्पित किया । बाकी बचे 12 चक्के का रथ दशहरा पर्व पर अपनी कुल देवी माँ दंतेश्वरी को अर्पित किया। इस परंपरा को आज भी दशहरा के दौरान 8 चक्के एवं चार चक्के के रथों का परिचालन कर निभाया जा रहा है । ओडिशा में जहां इस पर्व को गुंडिचा के नाम से जाना जाता है वहीं बस्तर में इसे अपभ्रंश के रूप में गोंचा पर्व के रूप में प्रचलित हो गया है ।