इंडिया बोला नमो नमः

0
26

रवि वर्मा/रायपुर

न्यूज़ चैनलों पर तीन दिन का तमाशा देख देखकर पक चुके दर्शकों का धैर्य अब जवाब देने ही वाला था कि 23 मई आ गया।
राम राम करके , सात चरणों वाला आम चुनाव अन्ततः निबट ही गया। इस बार के चुनाव में जहां जनहित से जुड़े मुद्दों को दफन करने का काम हुआ वहीं गांधी,नेहरू से लेकर राजीव तक को इतनी गालियां पड़ीं की बेचारे जन्नत में भी शायद बेचैन हो गए।
बहरहाल आज सुबह 10 बजे के लगभग जब टीवी खोला तो एनडीए को 300 के लगभग सीटों पर बढ़त के संकेत दिखने लगे थे। अभी यह आंधी 350 के आसपास पहुँच गई है। उन राज्यों में भी जहां हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सरकार बनाई है, वहां भी मतदाता ने बीजेपी की झोली वोटों से भर दी है। यह भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है।
वाराणसी में मोदी आगे, गांधीनगर में अमित शाह आगे, भोपाल में प्रज्ञा आगे, रायपुर में सुनील सोनी आगे, बिलासपुर में साव आगे, उत्तराखंड और हरियाणा की सभी सीटों पर बीजेपी आगे – खबरें दोपहर 11 बजे तक देश की जनता का मूड दिखा रही थीं।
अब महागठबंधन और कांग्रेस चाहे इसे ईवीएम का दोष बताकर बच निकलने की कोशिश करें या फिर अपने दल के अंदर पराजय के कारणों की निष्पक्ष समीक्षा करें – जनादेश तो जनादेश है और साफ़ है। प. बंगाल में भी ममता के मज़बूत किले में बीजेपी ने सेंध लगाने में इस बार सफलता पा ली है, जो सचमुच चमत्कारी है। इस टिप्पणी के पोस्ट करते तक 17 राज्यों में तो कांग्रेस का खाता ही नहीं खुल पाया है।
अब हम और आप इसे मोदी के प्रचारतंत्र की जीत मानें या मोदी का करिश्मा – जीत तो उनकी ही है। सबसे चौकानें वाली बात यह रही कि आज के परिणाम 2014 के परिणामों से भी बेहतर रहे और जनता जनार्दन ने देश में फिर स्थिर सरकार देकर बता दिया कि उसे देश में स्थायित्व चाहिए। हम जैसे राजनीति समीक्षक जिन्हें लगता था कि नोटबन्दी, जीएसटी, रोज़गार,महंगाई और राफ़ाल जैसे मुद्दों को लेकर जनता में बड़ा आक्रोश है, उसका जवाब जनता ने दे दिया कि उसे इन सबके बावज़ूद भी बीजेपी पसन्द आ रही है। व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग जो जीएसटी के कारण मोदी से अलग खड़ा दिख रहा था, उसका विरोध भी न जाने इस तूफ़ान में कहां उड़ गया?
मोदी की इस जीत के पीछे राष्ट्रवाद का एजेंडा है या चुनाव की बेहतर पैकेजिंग यह कह पाना अभी मुश्किल है। धीरे धीरे जब वोटिंग पैटर्न सामने आएगा तभी राज्यवार स्थिति स्पस्ट हो पाएगी। अभी तो बीजेपी मोदी नाम की सुनामी पर सवार है, जो उसे होना भी चाहिए।
इन चुनावों से एक और मुद्दा सामने आया है कि अगर क्षेत्रीय दल चुनाव पूर्व बेहतर तालमेल बनाते हुए अच्छी रणनीति और सही मुद्दों के साथ जनता के सामने जाने में असफल रहे तो जनता उनसे भी मुंह मोड़ सकती है। यूपी में समाजवादी और बसपा इसके उदाहरण हैं। जनता ने इनके जातिवादी विचारों और जोड़ तोड़ की तिकड़मों की हवा निकाल दी है।
शाम होते होते राहुल प्रेस के सामने आए तो ज़रूर लेकिन पांच मिनट से ज़्यादा टिक नहीं पाए और सबसे बड़ी गलती उन्होंने यह की कि अपने इस्तीफ़े की पेशकश उन्होंने मीडिया के सामने नहीं की। उनकी बहिन प्रियंका जिन्हें इंदिरा का अवतार बताकर अवतरित किया गया था, वह भी पूरी तरह बेकार साबित हुईं। अब गांधी परिवार में से किसी में अगर थोड़ी सी भी समझदारी बची हो तो उन्हें अब समझ में आ जाना चाहिए कि कांग्रेस को हराने के लिए किसी विपक्षी की ज़रूरत ही नहीं होती। कमलनाथ ने जिस तरह अपने कट्टर राजनीतिक दुश्मनों दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ठिकाने लगवाया और अपने पुत्र नकुलनाथ को जिता ले गए, उससे पार्टी की अंदरूनी स्थिति उघड़कर सड़क पर आ गई। अब कमलनाथ की सरकार गिराने के लिए ये दोनों ही भस्मासुर साबित होंगे। अब इतनी फ़ज़ीहत के बाद भी अगर कांग्रेस न चेती तो कांग्रेस मुक्त भारत सिर्फ़ बीजेपी का सपना नहीं रह जाएगा।
छत्तीसगढ़ में भी जिस तरह की बयानबाजी भूपेश मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्री टी एस सिंहदेव ने की, वह पार्टी की अंदरूनी स्थित को उजागर करता है। हालत यह है कि भूपेश से बदला लेने के चक्कर में कांग्रेसियों ने नौ सीटें बीजेपी को भेंट चढ़ा दीं। अब ऐसी स्थिति वाली पार्टी को उबार पाना कम से कम राहुल गांधी के बस का तो नहीं दिखता।
बहरहाल आज का दिन मोदी का है और आने वाले पांच साल भी उनके ही होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपनी पिछली गलतियों से सबक लेंगे और  गरीब और मध्यम वर्ग की दुश्वारियों को सचमुच कम करेंगे। मोदी जी और उनके सहयोगियों को बधाई।