पूरे देश में श्रद्धा, उल्लास और पंरपरा के अनुसार मनाया जा रहा है मकर संक्रांति

0
20

नई दिल्ली। देशभर में आज मकर संक्रांति श्रद्धा, उल्लास और पंरपरा के अनुसार मनाया जा रहा है। हालांकि, कई जगह इस कल भी मनाया गया। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस अलग-अलग नामों से जानते हैं। सूर्य भगवान को समर्पित इस त्योहार पर लोग नदियों में पवित्र स्नान करते हैं। मकर संक्रांति पर स्नान, दान के साथ भगवान सूर्य की पूजा का विशेष महत्व होता है। पंरपराओं के अनुसार आज सूर्य उत्तरायण होता है और मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी के साथ ही एक महीने से चला आ रहा खरमास का समाप्त होगा और शादी-विवाह समेत मांगलिक कार्य शुरू होंगे। सूर्य की पूजा और काले तिल और गुड़ का उपयोग भी त्योहार का अभिन्न अंग है। मकर संक्रांति को मनाने के लिए देश के विभिन्न स्थानों पर कई मेले लगते हैं। हर 12 साल में हरिद्वार, प्रयाग (प्रयागराज), उज्जैन या नासिक में कुंभ मेला आयोजित होता है।मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले कुछ मेले में प्रयाग में माघ मेला, बंगाल में गंगासागर मेला, ओडिशा में मकर मेला, झारखंड और पश्चिम बंगाल का टुसू मेला और पश्चिम बंगाल में शांतिनिकेतन का पौष मेला शामिल हैं। मकर संक्रांति देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाई जाती हैतमिलनाडु में मकर संक्रांति पोंगल के रूप में मनाया जाता है, यह चार दिवसीय त्योहार है जिसे भोगी पंडिगल, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल और कन्नुम पोंगल में विभाजित किया गया है। राजस्थान में सकरात या मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है, इस दिन को विशेष राजस्थानी व्यंजनों और मिठाइयों जैसे फेनी, तिल-पट्टी, गजक, खीर, घेवर, पकोड़ी, पुवा और तिल-लड्डू के साथ मनाया जाता है। लोग पतंगबाजी में भी शामिल होते हैं।उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इसे खिचड़ी नाम से जानते हैं। इसमें एक अनुष्ठान स्नान शामिल है, जिसे देखने के लिए लाखों लोग उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और वाराणसी और उत्तराखंड के हरिद्वार में इकट्ठा होते हैं। तिल के लड्डू और गुड़ के लड्डू के साथ-साथ नए कपड़े पहनना भी त्योहार का एक अभिन्न अंग है। पतंगबाजी यहां भी एक अनिवार्य हिस्सा है।बिहार और झारखंड में भी इसे खिचड़ी कहते हैं। इसे चुरा, गुड़, तिल, तिलवा जैसे व्यंजनों के साथ मनाया जाता है। लोग अपने दिन की शुरुआत पूजा-अर्चना के साथ करते हैं। उसके बाद लोग दही चुरा का आनंद लेते हैं।गुजरात में उत्तरायण नाम से इसे दो दिनों तक मनाया जाता है और आमतौर पर लोग पतंग उड़ाकर जश्न मनाते हैं। असम में इसे माघ बिहू और भोगली बिहू कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में इसे संक्रांति और पौष संक्रांति के नाम से जाना जाता है।