रोहिंग्या बच्चों के निर्वासन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, नागरिक सुविधाएं मांगी

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नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय में एक नई याचिका दायर की गई है, जिसमें देश से रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों के निर्वासन को चुनौती देते हुए उनके लिए मूलभूत नागरिक सुविधाएं मांगी गईं हैं। माकपा की युवा शाखा ‘भारतीय जनवादी नौजवान सभा’ (डीवाईएफआई) द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि बच्चों को वापस उनके देश भेजना संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि 1989 के प्रावधानों का उल्लंघन है।
संधि के प्रावधानों का जिक्र करते हुए याचिका में कहा गया है कि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय, विकलांगों और शरणार्थियों सहित अन्य बच्चों के संरक्षण की बात कही गई है। याचिका में कहा गया है कि भारत सरकार पर सभी बच्चों को बाल अधिकार संधि 1989 के तहत दिये गये अधिकार मुहैया कराने का दायित्व है, जिसमें वे बच्चे भी शामिल हैं, जिनके पास भारत की नागरिकता नहीं है। संधि पर हस्ताक्षर करने के नाते सरकार पर बच्चों को सभी प्रकार के भेदभाव से बचाने का दायित्व है। याचिका में शरणार्थियों को आश्रय शिविरों में बेहतर सुविधाओं की भी मांग की गई। शीर्ष अदालत ने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ और इनके पक्ष में दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 13 अक्तूबर की तारीख तय की।

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